भीड़ में तो सब अकेले होते है
हम तो अपनों के बीच अकेले है
जुड़े है कितनो से मालूम नहीं
पर हम से कब जुड़ा कोई याद नहीं
हर रिश्ता जुड़ता है स्वार्थ से
हर रिश्ता कसता है बन्धनों में
मन की सच्चाई से जी भी न सके
कहने को पूरी आज़ादी है
सारी दुनिया दूसरो को समझते रहे
क्या समझा है
हमें कभी किसी ने
आज इसी गुत्थी को सुलझाने में
हम
हैरान परेशां बेठे है
विनोद पासी
"हंसकमल"
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