मति जब कुमति हो जाए
तो कुछ भी ठीक नहीं लगता
अच्छे बुरे का ज्ञान नहीं रहता
संगत में मन नहीं रमता
सारा समाज, सारा चक्र
सारी व्यवस्थाये, सारे संस्कार
सारे रिश्ते नाते, सारे मित्र-गन
बस सब कुछ उल्टा लगता है
लगता है जैसे कोई साज़िश रची हो
अपनों द्वारा हमारे खिलाफ
हम सोच नहीं पाते की हमारी
हमारी अपनी मत ही मारी गयी है
हम सब मे अवगुण दूंड़ते है
अपनी कमियों और दोषों को
खुद ही देख नहीं पाते
मति कुमति हो जाए जब
तो कुछ भी ठीक नहीं लगता
बस कुछ भी ठीक नहीं लगता
ठीक लगता है तो बस
केवल अपना दृष्टिकोण
विनोद पासी "हंसकमल"
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