Wednesday, 4 July 2012

मेरे दिल की व्यथा को, तुम ही जानो जानूँ
फिर क्यों मेरे पास नहीं तुम, य़े मैं कैसे  जानूँ

पलभर का भी साथ नहीं, पर जानूँ जैसे जन्मो से
हरपल ह्रदय में बसे रहते हो, मैं  तो बस इतना जानूं

मेरी सांसों में बसते हो, मुझको तुम ऐसे पढते हो
जैसे हूँ कोई खुली किताब, कभी तो छू लो पन्नो को

मुझको भी एहसास दिलायो, कि मैं हूँ सिर्फ तुम्हारी
सिमट जायूंगी, बिखर जायूंगी, टूट जायूंगी
बाँहों में भर लो एक बार कह के मुझको प्यारी


विनोद पासी "हंसकमल"

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