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Saturday, 30 June 2012

मेरे बचपन का साथी


मेरे बचपन का साथी
बहुत पहले छोड़ गया था मुझे
तब जल्दी थी बड़ा होने की
खूब धन दौलत शोहरत कमाने की
पर उसकी चाहत थी मेरे संग रहने की


मैं कब से जी रहा हूँ
अपनी वाणी, अपनी सोच पर
अंकुश लगाता, परिचितों और अंजानो
की भीड़ में, अपने को हमेशा अकेला पाता


कभी कभी उसे लौट आता देख
मैं प्रफुल्लित हो उठता हूँ
लौट जाना चाहता हूँ उसके संग
खेलना चाहता हूँ उन संगी-साथियों के संग
उन गली कूंचो में, उन धूल भरी राहों में
उन कीचड भरे बिन घास के मैदानों में
जहाँ हमने बरसो पहले, समय  साथ बिताया-
पर अब वो मुझे पहचानता ही नहीं-

वो मिलता है, मुझे अपने आसपास के बच्चों में
उनकी खिलखिलाती हंसी में, उनके भोलेपन में
उनकी अटखेलियों में, उनकी शौख शरारतों में
इन्हें भी वो छोड़ देगा, कुछ वर्षो में -

वह सब के साथ रहकर
भी रहता है केवल उनके साथ
जिन्हें खुद अपनी पहचान नहीं
जिन्हें ज़माने से कुछ लेना देना नहीं
जो खोये है सिर्फ अपने में

हम सब तो बस बन गए है
इस सभ्य समाज का एक
धुंधला  प्रतिविम्ब


विनोद पासी "हंसकमल"