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Wednesday, 4 July 2012

सुनामी



सुनामी की प्रलय ने दिखला दिया
प्रकृति के कहर के सामने
हम मिटटी के खिलौनों से कमजोर
दम्भी मानव जात के सिवा कुछ नहीं

पाताल की भृकुटी ज़रा सी क्या तनी
जलजला और हाहाकार मच गया
हजारों -लाखों लोगों को काल
पलभर में निगल गया

हमने करोड़ों डॉलर  और येन निवेश करके
जिन शहरो और स्थलों को बसाया
वो बह गए तिनके की तरह पलक झपकते  ही
मिट गए नामों-निशान , नाभकीय संयंत्रो को भी उड़ा
खडी कर  गयी नयी चुनौतियाँ

हमने पुरे विश्व में फतह की
हमने पर्वतों के सीने काटें
हमने नदियों के मुहं मोड़े
हमने समुन्द्रों को भी बांधा

पर क्या कोई बांध सका है
उस महाप्रलय को -
जिसने बहा दिए शहर के शहर
दिखा के अपना  रूद्र रूप

प्राकतिक संसाधनों का दोहन बंद करों
विकसित करो पुरे विश्व को एक समान
नहीं तो यह जलजले और सुनामी यूं
ही आते रहेंगे, कभी वहां तो कभी यहाँ

विनोद पासी "हंसकमल"

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