Saturday, 30 June 2012

यौद्धा तथा संग्रालय


देश विदेश के हर बड़े शहर में अक्सर
संग्रालय देखने को मिल ही जाते है
जिनमे सजा होता है राजे महाराजायो
का व्यक्तिगत साजो- सामान, उनके कमरे,
उनकी ठाठो भरी जिंदगी के कुछ चित्र
उनके सुने पड़े अस्बतल, उन्हे  मिली भेंटे,
और युद्ध के परम्परागत हथियार
नेजे, भाले, तलवारे, टोपे, खंजर,
लोहे की बनी टोपिया, अंग-रक्षक कवच
और अमानवीय यातनाये देने वाले यन्त्र
कुछ भीती चित्र भी मिलते है उनके अजीबो
गरीब शौको के, उनके सेना नायकों के और
उनके आगे हसरतभरी निगाहों से देखती प्रजा के  
पर नहीं मिलते  वो  संग्रालय  कहीं जहाँ हमारे
पूर्वजो नें हमें संस्कार दिए थे, कहीं नहीं देखे
वो घर जिनमे सभ्यता की शिक्षा मिलती थी
बड़े बड़े सूर्मायों के, यौद्धायों  के पुतले भी दिखे , 
शहरो में, प्रेरित करते हुए कुछ नौजवानों को ?
पर क्या युद्ध में लड़कर  ही  कोई योद्धा  बनता है?
क्या वो ही सिपाही है जो सीमा पर सुरक्षा करता है?
हम सब भी अपने आस पास हर रोज कई
छोटे छोटे युद्ध ही तो लड़ रहे है, कभी घर में,
कभी ऑफिस में, कभी रिश्तो में,  कभी रिश्तो से
कभी बुराइयों से, तो कभी अपने आप से ही,  
हमसे मिल कर ही खड़ी हो रही है एक सेना
जो समय आने पर रक्षा करेगी इस देश की
सभ्यता, साहित्य, संस्कार और अपनी अस्मिता की
विनोद पासी "हंसकमल" 29.6.2012

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