Saturday, 30 June 2012

ऐसे में कविता कैसे हो


ऐसे में कविता कैसे हो


तुम अक्सर मुझसे य़े कहती हो
कभी शब्दों से, कभी वाणी से
कभी पलकों से, कभी नयनों से,
क्या हुआ तुम्हे है आजकल
जो कविता-मोह ही छोड़ दिया


तुम  य़े भी तो  कहती हो, क्या हुआ
तुम्हारी कोमल भावनायों को
क्यों ह्रदय पाषाण-सा हो गया
क्यों होता उसमे कुछ स्पंदन नहीं?
क्या दिखावा था वो कवि-ह्रदय
जिससे था मैंने प्यार किया?
क्या मुद्दे कम है लिखने को
या न लिखने की ठानी है ?


तो सुनो प्रिय, मैं आज तुम्हें  बतलाता हूँ
न लिखने का कारण समझाता हूँ
न मैं बदला हूँ , न बदली है भावनाएं 
बदला है तो बस य़े ज़ालिम ज़माना


जहाँ हर कस्बें हर सूबे, हर शहर में
कूड़े-करकट के ढेर हों 
जहाँ जगह जगह इंसानी मूत्र के दुर्गन्ध हों 
जहाँ कुतों और सुअरों  का राज हों 
जहाँ भूख से व्याकुल जानवर हों 
जहाँ जानवरों से बदतर इंसान हों 
जहाँ करोड़ों लोगों की  आंखे सूनी हों 
जहाँ हर शहर मिट्टी घट्टे में लिपटा हों 
जहाँ पाप पुण्य की मर्यादें  मिट जाए
ऐसे में कविता कैसे हो, ऐसे में कविता कैसे हो


जहाँ खाद्य पदार्थों में मिलावट हों 
जहाँ प्राण-रक्षक दवाइयां  भी नकली हों 
जहाँ बेईमानी घूस-खोरी का आलम हों 
जहाँ फर्जी डिग्रियां और मार्क्स शीट्स  बिकती हों 
जहाँ बैगों में लड़कियों के कटे अंग मिलते हों 
जहाँ वहशीपन का उन्मांद हों 
जहाँ लूट-खसोट और अंतहीन लालच हों 
जहाँ जनता पर  गरीबी-भुखमरी का शाप हो
ऐसे में कविता कैसे हो, ऐसे में कविता कैसे हो


जहाँ द्रौपदी के वस्त्र ले लम्बे टी वी सिरिअल्स हों 
जहाँ चैनलों पर विज्ञापनों का जाल हों 
जहाँ लाइव शोज्स  में नग्नता फैशन हों 
जहाँ महिलाये घरो को तोडती हों,
जहाँ मर्यादाएं पाँव तले रोंद्ती  हों 
ऐसे में कविता कैसे हो, ऐसे में कविता कैसे हो

जहाँ हर महिला बलात्कार के साये में जीती हों 
जहाँ बच्चो से मादक पदार्थ वितरित करवाते हों 
जहाँ सुरक्षा कर्मी ही जनता को नोचते हों
जहाँ धर्म-राजनीति-शिक्षा-चिकित्सा  सब व्यापार हों
जहाँ धर्म गुरुयों पर भी संगीन  अपराध हों
जहाँ कानून भी बस  एक खिलवाड़    हों 
जहाँ  जिन्दगी के दोहरी मापदंड हों
जहाँ जीना भी एक दिखावा हो
ऐसे में कविता कैसे हो, ऐसे में कविता कैसे हो


जहाँ नेताओ पर गंभीर चार्ज हो
जहाँ सांसद जूते-चप्पलो से बात करे
जहाँ बात बात पे वाक-आउट हो
जहाँ अपराध ही समाचार बने
जहाँ हवा-पानी भी प्रदूषित हो
जहाँ धरती में कीट नाशक उर्वरक हो
जहाँ कन्या  भूर्ण हत्या भी पाप न  हो 
जहाँ हिंसा और आगजनी का संगम हो
ऐसे में कविता कैसे हो, ऐसे में कविता कैसे हो

जहाँ मीडिया पूँजी-पतियों  की कटपुतली हों 
जहाँ भाई-भतीजावाद और बेईमान नेता हों 
जहाँ मानव-मूल्यों का सम्पूर्ण हनन हों 
जहाँ बेफजूल का शोर शराबा ही तहज़ीब हों 
जहाँ दिखावा ही परम मन्त्र हों 
जहाँ कत्लो-उपरांत  भी कोई कातिल सिद्ध न हों 
ऐसे में कविता कैसे हो, ऐसे में कविता कैसे हो


प्रिय-
वह काव्यमयी ज़माना लद गया
जब काव्य, काव्य होता था
जब उसमे छंदों  और मात्रायों के सीमायें थी
उन सीमायों  को न जानते हुए भी 
कबीर और रहीम के दोहे, स्वयं
उनमे मोतियों स्वरूप पिरोये हुए होते  थे

प्रिय- 
उस समय हवाएं स्वच्छ थी,
पक्षी भी गाया करते थे
लोग साफ दिल और सीधे थे
टीवी और मनोरंजन की दुनिया से
कवि मन दूषित न था
तभी तो कालिदास कुमार संभव  
और शकुंतला जैसी  सर्जना कर पाया

प्रिय-
वक़्त तब भी अच्छा था, जब
दिनकर, प्रसाद, निराला, बच्चन 
काव्य जगत पर छाये थे
उनकी काव्यात्मक रचनायों को सुनने
श्रोता -गन दूर दूर से आते थे

प्रिय-
जिसे तुम कविता समझती हो
वह कविता नहीं, शब्द जाल है
वह गाई नहीं जाती, सुनाई नहीं जाती
यह छपती कम, छपाई ज्यादा जाती है
यह सुर-हीन, संगीत-विहीन, जनता की
कविता कभी बनी नहीं, इसमें वेदना है
सम्वेदनाये है, दर्द है, एहसास है
पर इसके मूल में  प्राण-मिठास नहीं

अब तुम्ही कहो ऐ प्राणप्रिये
ऐसे में कविता कैसे हो, ऐसे में कविता कैसे हो 

विनोद पासी "हंसकमल"
सितम्बर 2006


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