Saturday, 30 June 2012

चमचा पुराण

चमचा पुराण

आयो यारो तुम्हे सुनाऊँ
कथा जो है कुछ सुनी सुनाई
सदियों पहले चली प्रथा य़े
 लाखों ने तो दी दुहाई
किसी ने सोचा, किसी ने भुगता
किसी ने इसको थोडा बदला

बहुत पूरानी बात है यारों,
एक राजा को मिला न्योता,
न्योता था इस ऐसी जगह से
जो थी अनजान शाही-परम्परा से
भांति भांति के शाही बर्तनों से

शुभ-मंगल के शुभ अवसर पर
राजा की भृकुटी कुछ तनी
देख तनी भृकुटी राजा की
बांदियाँ आयी दौड़ी दौड़ी
"चमचा लायो , चमचा लायो"

राजा का फरमान यही था
मंत्रीगण परेशां बहुत था
चमचे का कुछ ज्ञान नहीं था

अर्दली नें काफ़ी समझाया
किसी को कुछ समझ न आया
एक बुद्धिमान ने बुद्धि दौडाई
चमचे की गुत्थी सुलझाई
आगे बढकर अपने अंजुली-पात्र से
राजा के मुख में खीर पहुंचाई

ह्र्श्धव्नी से महल जो गूंजा
एक आवाज उठी धीरे से
"चमचा, चमचा हाय चमचा"

फिर लोगों ने अक्ल दौडाई
चमचे को एक शेप दिला कर
खाने में सम्मान दिला कर
ज़ग में इसको इज्जत दिलवाई

चमचे ने फिर नाम कमाया
नाम भी ऐसा क्या कमाया
हर चीज़ को अपना गुलाम बनाया
नमक, मिर्चं, हल्दी, चीनी, घी, तेल
सब पर अपना आधिपत्य जमाया
साहेब-बीबी का मन बहलाया
स्वादिष्ट खाना उठा मेज से
सीधे उनके मुहँ में पहुँचाया 

ज्यों ज्यों समय बदलता आया
चमचा रूप बदलता आया
हर श्रेत्र में, हर अहम प्राणी को
चमचा स्वयं पकड़ता आया

हाँ में हाँ जी, ना में ना जी
चमचागिरी की रीत पुरानी
अफसर नाखुश, बीबी खुश
यह भी है एक रीत पुरानी


नयी नीति के नए चमचों ने
अफसर-हित को स्वयं-हित समझा
पाकर वफादार स्वार्थी चमचे
अफसरों नें पासा पलटा


राजनीति और फिल्म जगत में
चमचा वर्ग कुछ ज्यादा चमका
इधर उधर की बातें करके
कभी मिटा तो कभी चमका


कभी कभी तो चमचो नें
नीतियों में भी टांग अडाई
चली तो "अफसर मूर्ख है"
नहीं तो मुहँ पर ठोकर खाई

चमचो का प्रभाव बहुत है
अफसर को भी ज्ञान बहुत है
चमचा वर्ग कुछ ज्यादा मूर्ख
अफसर वर्ग बलवान बहुत है

अफसर का है क्या भरोसा
जब चाहो जिसको फेंक दिया
वेटिंग लिस्ट में पड़े है बहुत चमचे
जिसको चाहो उठा लिया


मेरी मानों तो यारों
कभी न किसी का चमचा बनना
हाथ पकड़ किसी का सीड़ी चड़ने से
बेहतर है खुद सीड़ी चड़ना


विनोद पासी "हंसकमल"

No comments:

Post a Comment