Sunday, 1 July 2012

दिल्ली में तेरह मार्च की एक शाम

अचानक बदली क्या घिर आयी
गगन की छाती फट आयी
शीतल पवन के झोंकों नें
किवाड़ खिड़कियाँ  बंद करवाई
कुछ पल में उम्रड़ते बादलों में
बिजली ने अपनी चमक दिखलाई



छोटी तेज बूंदों ने  षण में
धरती पर प्रदापन किया
तड़ाक तड़ाक के चपेटो से
ओलों ने उनका पीछा किया

हरी-भरी डूब पर, रुई सृद्र्ष बर्फ बिखर आयी
नन्हे कोंपल पौधों की अकस्मात मौत चली आयी
गृहणियां घरो से बर्तन ले बाहर आयी
बच्चों के लिए तो जैसे बाहर तमाशा लाई

कुछ पलों को सफ़ेद चादर से ढकी य़े शाम
हर और खुशियाँ ले आयी
आज की शाम तो मानों हमें
दिल्ली से पहलगाम ले आयी

विनोद पासी "हंसकमल"

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