अरुणा, ओ सूर्य की लाली
दबे पाँव क्यों आती हो
जानू न क्या चुपके से
कर्णों में कह जाती हो
तुमसे मैं मिलने आता हूँ
तुम कहीं ओझल हो जाती हो
निराश जब मैं हो जाता हूँ
तुम गीत ख़ुशी के गाती हो
प्रथम लालिमा ओ सूर्य की
अंग-रक्षक बन आती हो
पथ-प्रदर्शन कर जीवन का
साँझ ढले ही जाती हो
ले ध्वजा-पताका जीवन की
जनमानस में प्रवेश करो
हो मानव मूल्यों का अंधकार जहाँ
उसे हे अरुणा, लालिमा युक्त करो
विनोद पासी "हंसकमल"
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