Sunday, 1 July 2012

एक रात मेरे लिए



जिंदगी की कई हसीन रातो में
याद तुम्हारी आती है
पर तुम्हारी जिस्मानी दूरी में
वो नीद में तब्दील हो जाती है

स्वपन-मिलन में कई बार
बाँहों में भींच लिया है मैंने
तुम्हे उस मीते दर्द का
एहसास भी हुआ होगा?

हुआ होगा ऐसा हे तुम्हारे साथ
सिमट आयी होगी घबरा के जब
सरंक्षण पाने फौलादी बाँहों का
आनंद आया होगा उस मधुर स्पर्श का

ऐसी ही एक रात जी दो
सिर्फ मेरे लिए,
समेटकर अपनी ज़िन्दगी पूरी
बस एक रात मेरे लिए

विनोद पासी "हंसकमल"

No comments:

Post a Comment