अरे दिनकर
इतने निष्टुर न बनो
क्यों तुमने ऊष्मा इतनी बड़ा दी
यह कोई जीवन का चुम्बन नहीं
आलिंगन है मौत का वसुंधरा से
क्या जलाकर रख कर दोगे
अपनी ही वसुंधरा को
कोमल पशु-पक्षियों को
वनस्थली और प्राणियों को
जल भुन जायेगे सब यहाँ
फिर कौन पूछेगा तुम्हे यहाँ
विनोद पासी "हंसकमल"
इतने निष्टुर न बनो
क्यों तुमने ऊष्मा इतनी बड़ा दी
यह कोई जीवन का चुम्बन नहीं
आलिंगन है मौत का वसुंधरा से
क्या जलाकर रख कर दोगे
अपनी ही वसुंधरा को
कोमल पशु-पक्षियों को
वनस्थली और प्राणियों को
जल भुन जायेगे सब यहाँ
फिर कौन पूछेगा तुम्हे यहाँ
विनोद पासी "हंसकमल"
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