मेरी भटकन,
क्या है, कैसी है , क्यों है
एक अंतहीन यात्रा
होश से मदहोशी टक
कभी बड़ी तो कभी घटी
कभी दबी तो कभी उभरी
प्रयत्न किये क़ि निकल पाऊँ
इसके गहरे च्रक्रव्यूह से
पर कभी बन्धनों में बांधा
तो कभी मुक्त हुआ
कभी पलके बिछायी
कभी दामन भिगोया
कभी हँसा तो कभी रोया
डूबा रहा अनगिनित सहारों में
फिर भी न ख़त्म हुई
य़े भटकन, य़े बेचैनी, य़े घुटन
कस्तूरी सी लुभाती रही
भगाती रही, अपने इर्द गिर्द
सभी साया बनी तो कबी
खो गयी तपती धूप में
क्या है, कैसे है, क्यों है
मेरी भटकन
एक अंतहीन यात्रा
विनोद पासी "हंसकमल"
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