Sunday, 1 July 2012

चित्र

दीवार पर लगे चित्र
उखड़े-उखड़े, बिखरे-बिखरे
रंगों का समिश्रण
बिगड़े ब्रुशों के द्वारा,
शायद कंपकपाते हाथों  से
कल्पना लोक में
सज से गए है

इन नीले, पीले, हरे, काले, जामुनी
लाल, भूरे और न जाने कितने रंगों में
वास्तविकता की बू है
अनजाने में
अन्तरदृष्टि को भा गया
जो तेरा चित्र
इन्ही तैल-चित्रों में
छिपा-सा कही नज़र आ रहा है
तडपा रहा है
बुला रहा है


विनोद पासी "हंसकमल"

No comments:

Post a Comment