नोट का टुकड़ा
नोट का टुकड़ा क्या बना,
पूरे विश्व को, सारे मानव मूल्यों को
अपने चंगुल में जकड गया
सब सुख चैन छीन लिया और
सुख चैन से भी खुद जुड़ गया
नोट के इस टुकड़े ने
ऐसा बांधा हर मानुस को
भावनाए भी
तुलने लगी
स्वम इसके तराजू में
इन्सान कोरे होने लगे
इसके मोह जाल में
नोट का यह टुकड़ा
कारण है बहुत समस्याओ का
और निवारण भी है बहुत उलझनों का
पर इस घमंडी ने कभी मुहँ नहीं
देखा कहीं किसी कूड़ेदान का
बस एक जेब से निकल दूसरी में जाता है
पलक झपकते ही ओझिल हो जाता है
नोट का यह टुकड़ा
नचाता है सबको अपने इर्द गिर्द
हँसाता है कभी, तो कभी रुलाता है
और कभी हँसता है हम पर,
हमारी विवशता पर, हमारी मूर्खता पर
कभी सांत्वना देता है अपनी गर्मी से
कभी आँखों से नींद चुरा लेता है
कभी खुली आँखों को सपने दिखा देता है
तो कभी ज्यादा पाने की चाह में
हवालात के भी दर्शन करवा देता है
तो कभी ज्यादा पाने की चाह में
हवालात के भी दर्शन करवा देता है
नोट का यह एक टुकड़ा
यह न कभी किसी का था, न होगा
इसकी फितरत में ही बेवफाई है
इसकी फितरत में ही बेवफाई है
विनोद पासी "हंसकमल"
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