Sunday, 1 July 2012

 एक नन्ही मासूम कली

 

नन्ही सी डरी डरी सहमी सहमी
एक सुन्दर कली हमारे आँगन आयी
कुछ घबरायी, कुछ बेचैन, कुछ परेशां
क़ि मैं  कहाँ दिल्ली  में आ फँसी
नाजों से नामकरण हुआ उसका
पर नाजों में न पल पाई
उसकी सादगी और सदाचार नें
छू  लिया ह्रदय हमारा और
वो भी  खिल खिल सी  गयी
पाकर निश्छल साथ  हमारा
जुड़ गयी हमसे ऐसे जैसे हो
वर्षो से था टूटा  नाता 



उसकी पलके बोलती है खामोश जुबान
उसका सोंदर्य करता है उसको परेशां
वो बेइंतिहा खूबसूरती क़ि है  मिसाल 
पर इसका भी उसको नहीं है  आभास 


उसके मन में  है  अनकही  उमंगें ,
वो  उड़ना चाहती है  नीलगगन में,
पर डरती है  अपने माहौल से
अपने पर विश्वास नहीं,  पर
अविश्वास की भी तो  कोई बात नहीं

हम चाहते है उसके सपने पूरे हो
उसका स्वयं पर भरोसा बने
उसे किसी के सहारे की ज़रुरत न  हो
वो स्वयं दूसरो का सहारा बने
वो मिसाल बने लोगो के लिए
रास्ते खुद ब खुद बन जायेंगे
जब वो खुद पर विश्वास करेगी
जब रखेगी  हर कदम विश्वास से
उसे अपनी ताकत पहचाननी होगी
उसे अपनी ताकत पहचाननी होगी 
 
  विनोद पासी "हंसकमल"

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