कितना व्यस्त रहते है हम दिन भर
कि वक़्त गुज़र जाता है पता नहीं कब
न अपनी होश न अपनों की खबर
उलझे रहते अपने काम काज में
कितना सोचते है की कभी वक़्त मिलेगा
तो यह करेगे, वो करेंगे
उनको मिलेंगे, वहां जायेंगे घुमने
कितना अच्छा होगा वो समां
और जब कार्यनिव्रत हो जाते है
तो नहीं होता वक़्त किसी के पास
हमारे लिए, सब व्यस्त है अपनी
रोजी रोटी कमाने में, अपनी समस्याओ
का हल निकालने में,
किसके पास फुर्सत है कि कोई बैठे
हमारे पास, और सुने हमारे अनुभव
अनुभव तो वही होता है जो स्वयम
अर्जित किया जाये कमा कर या गवां कर
हम ही कब बैठ पाए थे उनके पास जो
कुछ वर्ष पहले सेवा-निर्वृत हुए थे
अब यह जिंदगी काटनी है यादों में
कभी कोई भुला भटका साथी मिल जाता है
तो बहुत अच्छा लगता है,
अब किसी से कोई गिला शिकवा नहीं
अब बस हम है और हमारी तन्हाई
विनोद पासी "हंसकमल"
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