Sunday, 1 July 2012

तुम्हारे स्पर्श मात्र से ही
सिहरन-सी उठ गयी है
ह्रदय की कम्पन बड़ गयी है
हथेलियों और कपाल पर 
तरेलियाँ-सी छा गयी है
और मैं भूलने लगा हूँ
अपना ही वजूद



अभी मेरा य़े हाल है
तो सोचो क्या होगा
उस वक़्त जब तुम 
लाल लिबास में लिपट
मेरे ही नाम का सिन्दूर लगा
आयोगी मेरे प्रांगन में 


विनोद पासी 'हंसकमल"

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