Sunday, 1 July 2012

चमचमाते महानगरो मे

चमचमाते महानगरो में


चमचमाते महानगरों में
जमीन तेजी से रूप बदलती है-
सर्प  की त्वचा सामान-

मनुष्य का रंग-रूप तो क्या
चेहरा और निगाहें भी बदलती है
यहाँ की संस्कृति और बेरहम चेहरे
खदेड़ देते है, इमारते बनने पर
इमारते बनाने वालो को

पर अपने गावं की मिट्टी पर आते ही
तरोताजा हो जाती वो वो सब यादें
यहाँ के पेड़, पौधे, पोखरे, जन, जंतु
मनुष्य कुछ भी तो नहीं बदला
यही तो वो धरोहर है
जिससे जुडी है हमारी सांसे
हमारी संस्कृति

महानगरो में तो हम 
अपने आप से ही  खो जाते है

विनोद पासी "हंसकमल"

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