Sunday, 1 July 2012

श्रीमान सम्पादकजी


श्रीमान सम्पादकजी-
मेरी रचनायों में
व्याकरण के अशुद्धियाँ न निकालना
न ही उन शब्दों का ठीक करने का
प्रयास करना, जो गलत लिखे गए है


आज के वक़्त में, क्या कोई किसी भाषा
को सम्पूर्ण शुद्धता से लिख या बोल पता है?
मैं तो वही लिखूना, जो मेरी जुबान है
जिसमे मैं शब्दों के अर्थ समझता हूँ


तुम्हारी शुधियाँ उनकी मौलिकता खो देंगी
उसे सजा-संवार के नयी कृति बना देंगी
आपका उदेश तो सही है पर
फिर वो मेरी कृति कहाँ रह पायेगी?

मेरी कृति तो वही है, जो मैं स्वयं हूँ
न व्याकरण की त्रुटियों से मुक्त
न भाषा का सम्पूर्ण ज्ञान
फिर भी करता हूँ प्रयास लिखने का

इससे प्लीज़ यूं ही रहने देना
बिना सजे स्वंरे, अपने मौलिक रूप में
लोगो को समझ आने वाली जुबान में
यह  गावं की  अल्हड लड़की है
इसे रहने दो, शहर के फैशन से दूर
यही इसकी   ख़ूबसूरती है 

विनोद पासी "हंसकमल"

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