उनकी रचनाये
होती है इतनी उत्कृष्ट
की समझ नहीं आता, किसी कहे कोई
सर्वश्रेष्ट
एक एक मोती से जुड़ कर बन रही है काव्य-माला
यहीं
माला है इस काव्यालय का उद्देश
रचनायो में गहराई भी, सच्चाई भी
दर्द भी, आह भी, प्यार
भी, भटकन भी,
प्यार की मिठास भी, शब्दों की सरलता भी
ममता
भी, विश्वास भी और अविश्वास भी,
माँ की ममता भी, पिता का प्यार भी,
कुछ गीत भी है, कुछ ग़ज़ले भी,
कुछ भजन भी है, कुछ नगमे भी
माँ की ममता भी, पिता का प्यार भी,
कुछ गीत भी है, कुछ ग़ज़ले भी,
कुछ भजन भी है, कुछ नगमे भी
क्या नहीं है नए कवियों की कृतियों में,
क्यों हम ढूंढे वो सच पुरातत्व में
क्यों हम ढूंढे वो सच पुरातत्व में
जो महसूस नहीं हुए बीते
कल में
आज की कविता शशक्त भी है, कमजोर भी ,
खुद को
खोकर भी ढूँढती है अपनी मंजिल,
कभी समेटती है अपने आंसू
कभी शोला बन बरसती समाज पर
कभी शोला बन बरसती समाज पर
अपने ही माहौल पर हंसती है
कभी
तो रोती भी है अपनी दुर्दशा पर,
फिर खुद ही उठ संभलती है
नयी चुनौतियों से जूझने के लिए
उसमे नदी की बहाव भी है और ठहराव भी
तो रोती भी है अपनी दुर्दशा पर,
फिर खुद ही उठ संभलती है
नयी चुनौतियों से जूझने के लिए
उसमे नदी की बहाव भी है और ठहराव भी
विनोद पासी "हंसकमल"
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