अनजाने चेहरों की भीड़
भीड़ भरे बाज़ार में
जिंदगी तेजी से खिसक रही थी
अनजान चेहरों की--
मैं भी चला जा रहा था
उसी भीड़ में बिलकुल अकेला --
किसी ने अपने बिछुड़े साथी को
संबोधित किया तेरे नाम से
और मेरी नज़रे तलाशने लगी
रेत में अवशेष ज़िन्दगी के-
वक़्त बहुत पीछे पहुँच
रुक-सा गया था
धुन्दल्के में कहीं
अनजान चेहरों की भीड़
अब भी चली जा रही है
पर मैं गुम हो चुका था
उन यादों में
जो कभी हमारी अपनी थी
विनोद पासी "हंसकमल"
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