Sunday, 1 July 2012

अंतिम यात्रा

कितना शांत सोया है मेरा हमसफ़र आज -
वर्षो की लम्बी थकन के बाद
आज न कोई ख्वाब है आँखों में
न चिंता, न नींद न आने की बेसर्बी


न उन्निंदी है न उठने की चिंता
बस मुख मंडल पर छाई शालीनता
झलक रही है झुरियों के आएने से
शांत सोयी है वो रूह जो हर पल लपेटे
रहती थी चिंताए अपने दामन में

अब न वो रातो का उठना उठाना होगा
न होगा कोई बतियाने को, न होगा
मेरा हमसफ़र दुनिया जहान का दर्द पीने को
न होंगे बिस्तर पर खराटे, न होगी बाथरूम
जाने की बार बार चेष्टा -
न बतियाँ जला कर पढने के उपक्रम होगा
खीज उठती थी उनकी जिन बातों  से
अब तरसेंगे कर्ण उन्ही को सुनने को

आज फुरसत नहीं है इन बातों को सोचने की

आज वक़्त है शालीनता से सोये अपने साथी को
चुपचाप निहारने का --
पर लोग आ जा रहे है,
कुछ झुण्ड बना खड़े है छाया में
इंतज़ार कर रहे है विधि संवत उसके
पार्थिव शरीर को  अंतिम घाट ले जाने का
आंसू रह रह कर छलक रहे है
एक पल भी नहीं मिल रहा दीदार का
सब तरफ बस गम का आलम है
मैं बेठी  हूँ, अपने और परायों के बीच
गुमसुम सी, न अपनी खबर है न होश
तैय्यारियाँ चल रही है उनकी अंतिम यात्रा की 


विनोद पासी "हंसकमल"

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