फिसलती जाती है हाथों से यूं वक़्त की डोर
क़ि जैसे निकल जाती हो बंद मुट्ठी से रेत
या निकल जाता है पानी मुट्ठी से, देकर अहसास
वक़्त कभी बाँधे नहीं बंधा किसी के ,
चलता रहता है अपनी गज्मस्त चाल
हम ही नहीं मिला पाते उसके
कदमो से अपनी कदम ताल
समझते है क़ि हम मुट्ठी में कर लेंगे उसे
पर क्या कोई जानता है उसका मिजाज़?
विनोद पासी "हंसकमल"
क़ि जैसे निकल जाती हो बंद मुट्ठी से रेत
या निकल जाता है पानी मुट्ठी से, देकर अहसास
जितना ज्यादा पकड़ मजबूत करते है हम
उतनी ही तेजी से फिसल जाती है वक़्त की डोरवक़्त कभी बाँधे नहीं बंधा किसी के ,
चलता रहता है अपनी गज्मस्त चाल
हम ही नहीं मिला पाते उसके
कदमो से अपनी कदम ताल
समझते है क़ि हम मुट्ठी में कर लेंगे उसे
पर क्या कोई जानता है उसका मिजाज़?
विनोद पासी "हंसकमल"
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