Monday, 2 July 2012

जैसे मैं कोई बिकाऊ वस्तु होऊं


मैं-
एक साधारण नैन नक्श वाली
गठीले बदन के परिपूर्ण स्त्री
किसी  की माँ, किसी की बेटी
किसी की पत्नी, किसी की बहु
किसी की बहिन , किसी की भाभी
किसी की ननद, किसी की जेठानी
इन्ही रिश्तो-नातों को पालती
जी रही हूँ अपने छोटे से परिवेश में

देश की लाखों महिलायों की तरह
मुझे भी कभी कभी कार्य-हेतु, दफ्तरों में ,
पुरुषो के बीच जाना पड़ता है
वहाँ पहुँचते ही, मेरी सब पहचाने
सब रिश्ते, छूट जाते है, बहुत पीछे,
मेरा एक ही वजूद रह जाता है
एक जवान, गठीला शरीर  और
मैं बन जाती हूँ बस एक देह,
एक जिस्म, एक बदन
वहाँ उनकी पैनी निगाहों से
मेरे अंग अंग को बेमतलब तोला
और परखा जाता है-
जैसे मैं कोई बिकाऊ  वस्तु होऊं


इन नपुन्सको  की कतार में
कोई मेरे नैन नक्श तोलता है
कुछ निगाहे वक्ष-भेदन करती है
कोई नितम्बो को निहारता है
तो कुछ चक्षु योनि-मन्थन करते है
कई मीठी मीती बातों से शब्दजाल
बुनते है, पर उनकी निगाहें भी तोलती है
मेरे बदन को, जैसे की मैं कोई बिकाऊ वस्तु होऊं

कभी कुछ कही-सुनी , पर अक्सर अनसुनी
फब्तियां गूंजती है मेरे कानों में,
हजारो चीटियाँ  बन नोचती है मेरी रूह को
मेरे पूरे वजूद को, घिन्न  आती है खुद से

आधुनिकता की इस दौड़ में,
वक़्त के इस मुकाम पर
मैंने सब सोचना छोड़ दिया है
अब मुझे शर्म नहीं आती, घिन्न नहीं आती
जिसे जो सुख मिलता है, ले,
मैं अपने काम से काम रखती हूँ
क्योंकि-
इस सभ्य कहे जाने वाले समाज में
तन थक कर भी हम सब  स्त्रियाँ
निर्वस्त्र ही तो घूम रही है
द्रौपदी के महाभारत से -
यह भेदती निगाहें हमें
स्वतंत्रता देती है वस्त्र पहनने की
पर लहू-लूहान  रूह को छुपाने की नहीं

विनोद पासी "हंसकमल"

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