अबोध बालक
मेरे मन का अबोध बालक
चुपचाप मेरे पास आया, और बोला
चलों आज झाड उठायें.
छोलिये के खेतों में जाएँमेरे मन का अबोध बालक
चुपचाप मेरे पास आया, और बोला
चलों आज झाड उठायें.
तितलियाँ और जुगनू पकड़ें
उसे देख मैं हैरान सा हो गया
और बोला- अब इस शहर में
कहीं कोई खेत नहीं होते
होती है कंक्रीट की इमारते
तितलियाँ और जुगनू तो
जीवित दिखते है रंग बिरंगी
महंगी किताबो में या
डिसकवरी चनेल्स पर
वह बोला-
चलों फिर छत पर चल कर
पतंग उड़ाते है, या लूटते है
किसी की कटी पतंग या मांजे को
मैंने कहा-
अब इस शहर में पतंगे नहीं कटती
कटती है तो बस जिंदगियाँ
अब लोग मांजे नहीं लूटते
लूटते है अस्मत लड़कियों की
वह कुछ समझा नहीं
पर उदास ज़रूर हो गया
कुछ देर रूककर फिर बोला
चलों असलम के कबूतरों
को छल्ले पहना आते है
उन्हें उडा कर देखते है
कितने और कबूतर लाते है
अपने झुण्ड में
मैंने उसे समझाया -
आजकल कबूतरबाजी बिज़नस है
इसमें झुण्ड किसी को लाता नहीं
अपने किसी साथी को बाहर छोड़ आता है
वह फिर उदास हो गया
कुछ पल सोचने के बाद फिर बोला
चलों पड़ोस की आंटी की मुर्गियों नें
अंडे दिए होंगे, और वो इस वक़्त उन्हें
निकाल रही होगी दढ़बे से,
चलों उसी को देखने चलते है
मैंने कहाँ, आजकल अंडे मिलते है बाज़ार में
और निकाले जाते है फ्रिज से
यह सुनकर उसका मन बहुत खिन्न हुआ
फिर वह खीज कर बोला लगता है
मैंने उसका क़त्ल कर दिया है
उसे छोड़ आया हूँ बहुत पीछे
शायद मुझे वह कोई भूत लग रहा है
तभी मैं उसके साथ न जाने के
बहाने ढून्ढ कर रहा हूँ
वह बोला-
सच सच बतायो के मुझसे बिछुड़
के तुम कैसे जी लेते हो इस शहर में
मैं तो तुम्हारा बचपन का साथी हूँ
मैंने कहा-
सब समय का चक्र है
यहीं प्रशन कभी तुम मेरे पूर्वजो से थे करते
आज मुझसे कर रहे हो, कल मेरी संतान से करोगे
मैं तुमसे नहीं कटा हूँ , मैं तो कटा हूँ अपनी मिट्टी से
अपने बाल्यकाल से, अपने साथियों से
अपनी सभ्यता से, अपने परिवेश से
मुझको तो हालातो ने उखाड़ कर गाड़ दिया है शहर में
तुमसे कटता, तो क्यों तुम्हे मिलने को हरपल बैचैन रहता
क्यों ख़राब करता अपनी नींदे और याद करता बचपन
तुम तो मिलने आये हो आज पहली बार
और परेशां हो गए इतनी जल्दी, मैं तो हर पल तुममे
ही रहना चाहता हूँ, मैं बहुत अकेला हूँ इस शहर में
यह सुनकर वो अबोध बालक, खुलकर मुस्कराया
और लिपट गया मुझसे, बिलकुल मेरे बेटे समान
विनोद पासी "हंसकमल"
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