Monday, 2 July 2012

खवाबों की दुनिया

खवाबों की दुनिया

मेरे खवाब, मेरे सपने ही तो हैं, मेरे अपने
मेरी इस खवाबों की दुनिया में
न कोई सामाजिक रीती रिवाज, न कोई बंधन
न कोई मजबूरी, न कोई रोक टोक
स्वत्रंत हूँ पूर्णता अपनी इस दुनिया में
न किसी से कोई चाहत, न गिला शिकवा

तुम कहते हो, छोडो एस सपनो की दुनिया को
खवाब आखिर खवाब ही होते है, सच नहीं
इनमे उड़ने से ठोकर ही लगती है,
आ जायो धरातल पर,
धरातल पर रहते-रहते ही तो मैंने
अपने इर्द-गिर्द अपनी य़े दुनिया बसाई है
इतनी ठोकरे, और जिल्लत पाकर
ही तो मैंने अपनी य़े दुनिया बसाई है
मैं खुश भी हूँ, और नाखुश भी

तुम्हारी दुनिया में भावनायों की कीमत नहीं
आंसुयों के कद्र नहीं , सच्चाई एक ज़हर है
वहाँ मैं नहीं, मेरा शरीर दिखता है लोगों को
वहाँ हँसते रहो, मुस्कराते रहो
सुन्दर दिखो, दूसरो के लिए
ह्रदय में गम छुपाये, बस जीते रहो
औरो के लिए, वो भी जो जीते नहीं मेरे लिए
जीते है अपनों के लिए

वहाँ किसी को वक़्त नहीं, बेठे पल भर पास
सिर्फ मेरे लिए, मेरे साथ, कुछ दुःख बाँट
लें हम एक दूसरे का, कुछ अपनी कहे कुछ मेरी सुने

जिन्दगी है तो समस्याएँ  होंगी ही
उन्हें सुलझाने के रस्ते भी होंगे हज़ार
कुछ बेदिया भी है, कुछ मजबूरियां भे है
पर सब उलझाने सुलझ सकती है
अगर कोई पकड़ ले प्यार से हाथ
और कहे, निकलो इस खवाबों के महल से
और आ जायो मेरे प्रांगन में
मैं पौंछ लूँगा तुम्हारे सारे आंसू
बस, मुझे सब अपने गम दे दो

विनोद पासी  "हंसकमल"

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