ओ प्रिय सुनो,
सब कुछ छोड़कर, छत पर आ जायो
पलभर बेठो संग और देखो
कुदरत का य़े हँसी नज़ारा
यूं तो प्रतिदिन सूर्यास्त होता है
सदियों से होता रहा है, होता रहेगा
पर क्यों न हम कुछ पल चुरा ले
और निहारें इस अद्भुत आलोकिक सोंदर्य को
भर लें अपने भीतर कुछ यादें इस समागम की
कुछ लोग मीलो चलकर जाते है
ऐसे स्थलों पर, फोटो भी उतारते है
कुछ चित्रों में कैद करते है मनोहारी दृश्य को
पर हम ऐसा कुछ नहीं करेंगे
बस निहारेंगे इसे और भर लेंगे
इसकी लालिमा का अद्भुत रूप
अपने भीतर हमेशा के लिए
लाखों-करोड़ों लोगो को शायद कभी
वक़्त न मिलता हो इसे देखने का,
सब व्यस्त है , दुनिया-दारी की बातों में
कुदरत नें तो सब को बक्शा है नज़ारा
हमने ही उससे मुहँ मोड़ लिया
य़े तो शाम को घर लोटते समय
बस में भी देखा जा सकता है
वो देखो, सावन के घने बादल-
बादलों में अपनी लालिमा से भरपूर
उतर रहा है क्षितिज की गोद में
एक विशाल-सा गोला,
कितना शांत, कितना लुभावना
थक हार कर सब कुछ भुलाने को बेताब
'
धीरे धीरे इस आग के गोले को
काले घने बादलों ने बीच में काटकर
तो-धारी फूटबाल बना दिया है
जो हर पांच मिनट में नीचे
काफी नीचे लुढ़कती जा रही है
मानों कोई डोर इसे धरती पर खींच रही हो
या फिर य़े स्वयं ही फिसल रहा है नीचे
अपनी चरम सीमा पर ऊष्मा बरसाता
यह सूर्य, अब खामोश होकर धीरे धीरे
लुप्त हो जाना चाहता है , समाना चाहता है
उस धरती की कोख में, जहाँ से हर सुबह
यह बेताब रहता है निकलने को
यह डूबता सूर्य
हमें बतला रहा है क़ि हर बलबान
शक्तिशाली को भी झुकना पड़ता है,
समय के साथ साथ उस मिट्टी में
मिलना पड़ता है जहाँ से उसका उदय हुआ
हमें भी इसका प्रकृति की गोद में समां जाना
कितना मोहक लग रहा है
क्योंकि इसमें अब ताप नहीं, अभिमान नहीं,
सिर्फ चुपचाप अस्त होने का भाव है
वह देखो,
कितना नीचे चला गया
आकाश में केवल बची है लालिमा
और वो देखते ही देखते ओझिल हो गया
कुछ पलों में सारा आकाश अंधकारमय हो जायेगा
और फिर चाँद को भी तो आना है शाम ढले
हमें घर बेठे ही मिल गया वो नज़ारा
जिसके लिए लोग न जाने कहाँ कहाँ जाते है
यह तो पूरी दुनिया में
हर शहर, हर गली मोहल्ले में
अपना यहीं रूप दिखाता है
हर जगह की यादें अलग चाहे हो
मौसम का हर रंग यहाँ भी आता है
आज सूर्यास्त देख आत्म-विभोर हो गए
हम और तुम
विनोद पासी "हंसकमल"
सब कुछ छोड़कर, छत पर आ जायो
पलभर बेठो संग और देखो
कुदरत का य़े हँसी नज़ारा
यूं तो प्रतिदिन सूर्यास्त होता है
सदियों से होता रहा है, होता रहेगा
पर क्यों न हम कुछ पल चुरा ले
और निहारें इस अद्भुत आलोकिक सोंदर्य को
भर लें अपने भीतर कुछ यादें इस समागम की
कुछ लोग मीलो चलकर जाते है
ऐसे स्थलों पर, फोटो भी उतारते है
कुछ चित्रों में कैद करते है मनोहारी दृश्य को
पर हम ऐसा कुछ नहीं करेंगे
बस निहारेंगे इसे और भर लेंगे
इसकी लालिमा का अद्भुत रूप
अपने भीतर हमेशा के लिए
लाखों-करोड़ों लोगो को शायद कभी
वक़्त न मिलता हो इसे देखने का,
सब व्यस्त है , दुनिया-दारी की बातों में
कुदरत नें तो सब को बक्शा है नज़ारा
हमने ही उससे मुहँ मोड़ लिया
य़े तो शाम को घर लोटते समय
बस में भी देखा जा सकता है
वो देखो, सावन के घने बादल-
बादलों में अपनी लालिमा से भरपूर
उतर रहा है क्षितिज की गोद में
एक विशाल-सा गोला,
कितना शांत, कितना लुभावना
थक हार कर सब कुछ भुलाने को बेताब
'
धीरे धीरे इस आग के गोले को
काले घने बादलों ने बीच में काटकर
तो-धारी फूटबाल बना दिया है
जो हर पांच मिनट में नीचे
काफी नीचे लुढ़कती जा रही है
मानों कोई डोर इसे धरती पर खींच रही हो
या फिर य़े स्वयं ही फिसल रहा है नीचे
अपनी चरम सीमा पर ऊष्मा बरसाता
यह सूर्य, अब खामोश होकर धीरे धीरे
लुप्त हो जाना चाहता है , समाना चाहता है
उस धरती की कोख में, जहाँ से हर सुबह
यह बेताब रहता है निकलने को
यह डूबता सूर्य
हमें बतला रहा है क़ि हर बलबान
शक्तिशाली को भी झुकना पड़ता है,
समय के साथ साथ उस मिट्टी में
मिलना पड़ता है जहाँ से उसका उदय हुआ
हमें भी इसका प्रकृति की गोद में समां जाना
कितना मोहक लग रहा है
क्योंकि इसमें अब ताप नहीं, अभिमान नहीं,
सिर्फ चुपचाप अस्त होने का भाव है
वह देखो,
कितना नीचे चला गया
आकाश में केवल बची है लालिमा
और वो देखते ही देखते ओझिल हो गया
कुछ पलों में सारा आकाश अंधकारमय हो जायेगा
और फिर चाँद को भी तो आना है शाम ढले
हमें घर बेठे ही मिल गया वो नज़ारा
जिसके लिए लोग न जाने कहाँ कहाँ जाते है
यह तो पूरी दुनिया में
हर शहर, हर गली मोहल्ले में
अपना यहीं रूप दिखाता है
हर जगह की यादें अलग चाहे हो
मौसम का हर रंग यहाँ भी आता है
आज सूर्यास्त देख आत्म-विभोर हो गए
हम और तुम
विनोद पासी "हंसकमल"
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