Friday, 6 July 2012

शहरो की चकाचौंध


शहर में इतनी रौशनी क्यों  कर दी
क़ि लोग अपनी राहें  ही भूल गए
वो गलियां वो चौबारे जो पहचान थी
अपनी राहों की, क्यों ख़त्म कर दी
कम करो य़े रौशनी और देखने दो मुझे
वो बुझे चेहरे जो छिपे है इसके पीछे
मुझे इतनी रौशनी मत दिखायों
क़ि ऑंखें चुन्दियाँ जाए और
मैं भूल जायूं अपनी  ही पहचान,
यहाँ से निकल कुछ और
देख ही न पाऊँ , न जान पाऊँ  क़ि
मेरे शहर के लोग किस हाल में
घुट घुट कर जी रहें है ज़िन्दगी
काश! तुम सुन सकते मेरी आवाज
कुछ  रौशनी उनको भी दे दो उधार



विनोद पासी "हंसकमल"

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