मैं जानता हूँ तुम्हारी क्यां उम्मीदे हैं
यह भी समझता हूँ क़ि तुम्हारी रूह
मेरी रूह को पाना चाहती है,
शायद कुछ ऐसी ही कसक.....
पर क्या करें , इस रूहानी मिलन में
यह देहें बीच में आ जाती है,
जिनसे निकलता है रास्ता
रूहों के मिलन का -
देहों की अपनी दुनियां हैं
उनके अपने हजारों बंधन है
हम एक बंधन में बंधने के लिए
गिरवी रख देते है अपनी देह को
रूह प्यासी रह जाती है इसके राख़ होने तक
अक्सर जीने के लिए सपनो का
ताना बाना बुन लेते है, मन ही मन
मनुहार कर लेते है, रूठ जाते है
मना लेते है, कुछ अन्तरंग पल
बिता लेते है, बिना किसी बंधन के,
खुशफहमी में जीते है य़े दोहरी ज़िन्दगी
सदियों से कुर्बान होती रही है चाहते
हम कब जिए है अपने लिए
विनोद पासी "हंसकमल"यह भी समझता हूँ क़ि तुम्हारी रूह
मेरी रूह को पाना चाहती है,
शायद कुछ ऐसी ही कसक.....
पर क्या करें , इस रूहानी मिलन में
यह देहें बीच में आ जाती है,
जिनसे निकलता है रास्ता
रूहों के मिलन का -
देहों की अपनी दुनियां हैं
उनके अपने हजारों बंधन है
हम एक बंधन में बंधने के लिए
गिरवी रख देते है अपनी देह को
रूह प्यासी रह जाती है इसके राख़ होने तक
अक्सर जीने के लिए सपनो का
ताना बाना बुन लेते है, मन ही मन
मनुहार कर लेते है, रूठ जाते है
मना लेते है, कुछ अन्तरंग पल
बिता लेते है, बिना किसी बंधन के,
खुशफहमी में जीते है य़े दोहरी ज़िन्दगी
सदियों से कुर्बान होती रही है चाहते
हम कब जिए है अपने लिए
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