इस चारदीवारी में सिसक रहा है
एक जमीन का टुकड़ा,
एक जमीन का टुकड़ा,
जो
उपजायू है पर आकर्षक नहीं
वो हर सुबह घर से निकलता है
अपने हिस्से के बादल की तलाश में,
और शाम निराश होकर लौट आता है
खोने को अपनी ही अँधेरी कोठरी में
वो हर सुबह घर से निकलता है
अपने हिस्से के बादल की तलाश में,
और शाम निराश होकर लौट आता है
खोने को अपनी ही अँधेरी कोठरी में
बादल तो समय समय पर आते रहे
अपने
टुकड़े को तलाश कर रम गए
अब भी घुमते है कुछ घुम्कड़ बादल
उसे चाहिए अपना एक अदद बादल
जिसके आगोश में समां जाए
रह जाए बस उसका होकर
उसे चाहिए अपना एक अदद बादल
जिसके आगोश में समां जाए
रह जाए बस उसका होकर
कुछ छींटे पड़े शीतल जल की
कुछ कोंपल खिले उस टुकड़े पर भी
कुछ कोंपल खिले उस टुकड़े पर भी
समय चल रहा है अपनी चाल
वो
टुकड़ा भी सूखता जा रहा है
उस टुकड़े तो डर सता रहा है
न मिला अपने हिस्से का बादल
तो कहीं वो बंजर न हो जाए
कहीं मरुस्थल न बन जाए
विनोद पासी "हंसकमल"
उस टुकड़े तो डर सता रहा है
न मिला अपने हिस्से का बादल
तो कहीं वो बंजर न हो जाए
कहीं मरुस्थल न बन जाए
विनोद पासी "हंसकमल"
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