Monday, 9 July 2012

चमचमाती रोशनियों के पीछे फेले
उन अंधेरो में मुझे कुछ घाव ऐसे मिले
क़ि मरहम कितना भी क्यों न लगाऊँ
जख्म है क़ि भरते ही नहीं ........

औरो के जख्म तो शायद मैं भर भी दूँ
पर कैसे मिटाऊँ वो जख्म जो रूह को मिले है
न वो जिंदगी थी न मौत, हर पल सिसकियाँ
लेती थी मेरी जिंदा लाश, पल का भरोसा न था


काश! कभी तुझे यह एहसास भी होता क़ि
जो जखम तूने दिए है, वो अब भी खुले है

घिन आती है मुझे अब भी अपने बदन से
कितना ही रगड़ लूं, खोफे-गंदगी जाता नहीं
तुने न सिर्फ नोचा है मेरे बदन को
मेरी रूह को भी तार तार कर दिया

काश कोई तुझे उसका रती भर भी सिला दे
जितना रुलाया है तुने, मुझे अपने नरक में

विनोद पासी "हंसकमल"

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