Wednesday, 11 July 2012

एक तलाक शुदा का दर्द


बांटा था सब कुछ, त्यागा  था अपनों को,
तेरे साथ के लिए, अपना घर बसाने के लिए
कुर्बान  की आजीविका,   तेरे कहने पर
ताक पे रख  डिग्रियां, बन के रह गयी
थी एक घरेलू  स्त्री.......
खुश भी  थी कुछ समय के लिए

तेरे घर में रोंपा अपने जिस्मो-जान को
बच्चों को पाला अपना समझ
उठाये नाज़ सगे संबंधियों और मित्रो के
एक एक सांस से सींचा था  चमन को

तुमने  ही  लगा  लांछन करवा
दिया कानूनन सम्बन्ध- विच्छेद
विरोध भी करती तो किस लिए....?
तुझ पर तो कुछ और ही धुन सवार थी 
क्या गलतियाँ सिर्फ मेरी ही थी ?

मैं बर्दाश्त करती रही, परिवार की खातिर
खामोश  रही रिश्ते  की खातिर, होटों को सिल,
जीती रही तुम्हारी मर्यादा की खातिर,
तुमसे बर्दाश्त न हुई  मेरी ज़रा सी भी स्वतंत्रता
किस अहम् को ठोकर लगी,क्या करती  ये जानकर
 दुआ भी नहीं निकलती अब इन लबो से

मेरी  तो जिन्दगी पटरी से उलट गयी 
न झोंका होता  खुद को  तेरी चारदीवारी में
न होती ज़रुरत पैसे की, जीने के लिए
तो कभी थूकती भी न, तेरे चंद  टुकडो पर
जो मिलते है हर महीने  भत्ते के रूप में
पर इंसान हूँ, इनकी ज़रुरत है जीने के लिए
इसलिए कई बार  राह तकती हूँ इस भीख का


विनोद पासी "हंसकमल"

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