माँ तूने ही मुझे सिखाया बचपन से खामोश रहना,
मैं तेरी शिक्षा पर चली और मोम सी पिघलती रही
जख्म छुपा मुस्कराती रही, खुद को ही नकारती रही
'वो' कितने सुर्खरूय हो जाते है अपना बीता कल बता कर
'वो' मुझसे भी उम्मीद रखते है मैं भी बता दूँ बीता कल
पर तेरी सीख बीच में आ जाती है, अधर सिल जाते है
दिल में भंवर सा उठता है, एक डर सा मन में लगता है
रातों को नींद नहीं आती, हर पल बेचैनी रहती है
तूने ही सिखाया सच बोलना और कुछ सच छुपाना
कुछ राज़ जुबान पे आते ही, उथल पुथल हो जाता है
मैं भी औरो की तरह, जीयूँगी कुछ राज़ छुपा कर
हम लड़कियां हों या औरते, अक्सर झूट बोलती है
क्योंकि पुरुषो में सत्य सुनने की शक्ति ही नहीं
"पेट में बात नहीं पचती" कह कर बदनाम हमीं तो होती है
यह क्या जाने य़े लोग, हम कितने राज़ छुपाती है
जो बात गर्भ गृह में छुप जाए वो होटों पर न आती है
वो साथ हमारे जाती है, वो साथ हमारे जाती है
विनोद पासी "हंसकमल"
कुछ भी हो जाए,कडवा घूँट पीकर भी चुप रहना ,
दिल मे राज़ दफ़न रखना , चाहे कुछ भी हो जाए मैं तेरी शिक्षा पर चली और मोम सी पिघलती रही
जख्म छुपा मुस्कराती रही, खुद को ही नकारती रही
'वो' कितने सुर्खरूय हो जाते है अपना बीता कल बता कर
'वो' मुझसे भी उम्मीद रखते है मैं भी बता दूँ बीता कल
पर तेरी सीख बीच में आ जाती है, अधर सिल जाते है
दिल में भंवर सा उठता है, एक डर सा मन में लगता है
रातों को नींद नहीं आती, हर पल बेचैनी रहती है
तूने ही सिखाया सच बोलना और कुछ सच छुपाना
कुछ राज़ जुबान पे आते ही, उथल पुथल हो जाता है
मैं भी औरो की तरह, जीयूँगी कुछ राज़ छुपा कर
हम लड़कियां हों या औरते, अक्सर झूट बोलती है
क्योंकि पुरुषो में सत्य सुनने की शक्ति ही नहीं
"पेट में बात नहीं पचती" कह कर बदनाम हमीं तो होती है
यह क्या जाने य़े लोग, हम कितने राज़ छुपाती है
जो बात गर्भ गृह में छुप जाए वो होटों पर न आती है
वो साथ हमारे जाती है, वो साथ हमारे जाती है
विनोद पासी "हंसकमल"
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