Monday, 23 July 2012

तुम जिस शहर में


विनोद पासी "हंसकमल"


तुम  रहते हो जिस शहर में  अभी
उससे  जुडी है यादें  कुछ   मेरी भी
जब भी कभी कोई धमाका होता है
दंगे फसादों में कुछ लोग मरते है
या तुम्हारे  शहर पर कुछ कहर बरसता है
तो  बरबस धड़कने तेज चलने लगती है
कहीं कोई हादसे का शिकार तो नहीं ....


जानने की बेताबी रहती है की तुम
और तुम्हारा परिवार ठीक ठाक है
बेबस मेरा मन चला जाता है
तुम्हारी और........


लोग प्रजातंत्र के लिए गोलियों की बोछार सह रहे है
आने वाली नस्ल के अनदेखे भविष्य के लिए अपनी
कुर्बानियां दे रहे है, नहीं जानते की प्रजातंत्र भी
कितना खोखला  है अन्दर से,
इजाजत देता है बोलने की, लिखने की,
चीखने चिलाने की, जलूस निकालने की
पत्थर बाज़ी करने की, और  सरकारी सम्पति
को नष्ट करने की
पर वहां भी कानूनी बंधन है
मर्यादायों में  रह कर ये सब कुछ करने के ,

शायद ने नौजवान  नहीं जानते की समाज में
केवल दो ही वर्ग होते है, एक वो जो  शाषण करते है
और दूसरे वो जिन पर शाषण किया जाता है

कितना खुदगरज  हो गया हूँ मैं भी
ज़माने के ९९ फ़ीसदी  शक्शो  की तरह,
तुम जो मेरे अपने हो, उसका
हाल जान कर संतुष्ट हो जाता हूँ
क़ि  चलो सब कुछ ठीक ठाक है
और मेरा दिल नहीं पसीजता उन
बेमौत  मारे जाने वालो के लिए
क्योंकि उनमे कोई मेरा अपना नहीं होता


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