एक सुई
सेकेंड की
बस एक सुई
टक-टक-टक-टक-
चारो दिशायो की परिक्रमा करती
घूम रही है
अपनी ही धुरी पर
सेकिंडो को मिनटों में
मिनटों को घंटों में
घंटों को दिनों में
दिनों को महीनो में
महीनो को वर्षो में
वर्षो को सदियों में
सदियों को शताब्दियों में
शताब्दियों को कालों में
और कालों को युगों में
बदलती जा रही है
अजन्म से...
बस एक सुई
सेकण्ड की.....
फिर भी यह
अनवरत उन्मुक्त भाव से
प्राणियों को अपने में उलझाये
निर्बद्ध रूप से, अपनी ही
मस्ती में घूम रही है
अपनी ही घुरी पर
विनोद पासी "हंसकमल"
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