Tuesday, 3 July 2012

उत्पति चक्र




बेसब्री की हद गुज़र जाने पर
आगोश में मैंने बेतहाशा चुम्बन लिए
और परिधान उतर अपने आलिंगन में 
जकड लिया था कई बार ..
शुरू के कुछ वर्षो में......

साँसों की ऊष्मा कम होती रही
और खमीरी देहो का मिलन
एक अनचाहा बोझ-सा 
लगने लगा, कुछ वर्षो बाद

समय के अन्तराल में,
दो अंकुर फूटे तुम्हारी कोख से
और फेलने लगे लतायो के रूप में
अपने ही इर्द-गिर्द, अपने ही आँगन में

आज जब एक लता के
मांसल टहनी झूल गयी
मेरी बाँहों में
तो में चिर निंद्रा से जगा
और ख़ुशी और चिंता में
हिचकोले खता , उस लता 
के सहारे को ढूँढने में
मग्न हो गया

विनोद पासी "हंसकमल" 

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