बेसब्री की हद गुज़र जाने पर
आगोश में मैंने बेतहाशा चुम्बन लिए
और परिधान उतर अपने आलिंगन में
जकड लिया था कई बार ..
शुरू के कुछ वर्षो में......
साँसों की ऊष्मा कम होती रही
और खमीरी देहो का मिलन
एक अनचाहा बोझ-सा
लगने लगा, कुछ वर्षो बाद
समय के अन्तराल में,
दो अंकुर फूटे तुम्हारी कोख से
और फेलने लगे लतायो के रूप में
अपने ही इर्द-गिर्द, अपने ही आँगन में
आज जब एक लता के
मांसल टहनी झूल गयी
मेरी बाँहों में
तो में चिर निंद्रा से जगा
और ख़ुशी और चिंता में
हिचकोले खता , उस लता
के सहारे को ढूँढने में
मग्न हो गया
विनोद पासी "हंसकमल"
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