स्वप्न लोक में विचरण करने
आयी मौत भयानक ------
आतंकित किया, अपने भयानक रूप से
सिहर उठा मन देख रूप विकराल
शक्षात्कार कराया अपने सत्य रूप का
परिचय कराया विभिन्न रूपों से,
और फिर छोड़ गयी अकेला
मैं विचरता ही रह गया,
घंटों शुन्य में,
जागने के बाद भी
है मौत !
अवश्म-भावी तू है ज़रूर,
पर क्या तू अजेय है?
आज भी प्राणी तुझसे भयभीत है
प्रतीक्षा में हूँ, कब मुझसे संघर्ष होगा
धूल-धुसित करूंगा तेरे अरमानो को
स्वीकार पराजय करवा के रहूँगा
मृत्यु के रणभूमि में
संभव है तू मुझे पराजित कर ले
पर याद रख , मैं फिर भी
आसीन न होने दूंगा
तुझे विजय-सिंघासन पर
अवश्म-भावी तू है ज़रूर,
पर अजेय तू नहीं, मैं हूँ मैं
मेरा स्वरुप पहचान
मैं सिर्फ एक बिंदु हूँ
बस एक बिंदु
जिसे लोग आत्मा कहते है
विनोद पासी "हंसकमल"
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