साड़ी में लिपटी एक नारी
लगती है खड़ी को बगिया में
क्या हुस्न भरी महिमा पाई
सोंदर्य भरी साड़ी लाई
बगिया की शोभा फूलों से
साड़ी की शोभा भी फूलों से
वो खिलते है बगिया में
य़े खिलाये जाते है साड़ी पे
वो खिलते अपने मौसम में
य़े बेमौसम भी खिलते है
वो बगिया के यौवन है
यह यौवन है साड़ी के
उनसे खिलती प्रकृति है
इनसे खिलती नारी है
वो नश्वर है पर खुशबू लिए
यह अनश्वर है पर खुशबू-विहीन
विनोद पासी "हंसकमल"
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