Tuesday, 3 July 2012

साड़ी के फूल




साड़ी में लिपटी एक नारी
लगती है खड़ी को बगिया में
क्या हुस्न भरी महिमा पाई
सोंदर्य भरी साड़ी लाई

बगिया की शोभा फूलों से
साड़ी की शोभा भी फूलों  से
वो खिलते है बगिया में
य़े खिलाये जाते है साड़ी पे

वो खिलते अपने मौसम में
य़े बेमौसम भी खिलते है
वो बगिया के यौवन है
यह यौवन है साड़ी के
उनसे खिलती प्रकृति है
इनसे खिलती नारी है

वो नश्वर है पर खुशबू लिए
यह अनश्वर है पर खुशबू-विहीन 

विनोद पासी "हंसकमल" 

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