वसुंधरा के कोरे आँचल पर
किसने अधिपत्य जमाया है
क्या रात की काली नागिन ने
इसको डंक लगाया है
प्रकाश को कर निर्जीव
अपनी चादर से ठक लिया
मानों निंद्रा ने सब नयनों को
पिला दी हो थोड़ी सी सुरा
सांसारिक बन्धनों से कर मुक्त
सुला के अपने आँचल मैं
चली मुझे भी स्वपन दीखाने
दिव्य, आलोकिक और बुरे
जुग-जुग जियो ऐ निंद्रा देवी
प्यार ऐसा है दिया
जैसा कभी जननी ने
अपने आँचल में था दिया
कर्त्तव्य- प्रहरी सूर्य नें
कर्त्तव्य- पथ दिखला दिया
लोतुन्गा फिर रात ढले
ममता के आँचल में
तुम्हारी गोद में
विचरने के लिए
विनोद पासी "हंसकमल"
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