Tuesday, 3 July 2012

आशा



आशा, तेरे रूप अनेक
कभी निराशा, कभी दुराशा
कभी आशामय जीवन खेल
तुझको समझ न पाया कोई
तू अपने में है बेमेल


बिन तुम्हारे जीवन बगिया
सुनी-सुनी सी लगती है
जीवन की  हर आशा भी
कभी निराशा बनती है

मैं अभी तक भटक रहा था
अनदेखी, अनजान, अनिश्चित,
जीवन की घनघोर घटायों में
परिपूर्ण निराशा के भंवर में

जब से तुमने इस निर्जन वन में
आशा की ज्योत जलाई है
पथ स्वयं सुगम बन गया
लक्ष्य दिखाई देने लगा है 
टूटे ह्रदय को दे सहारा तुमने 
अपने अटूट बंधन में बांध लिया 

ओ प्रेरणा की स्रोत्र, आशा
तुह्मे अपनी अर्धांगिनी के रूप में
देखना चाहता हूँ, जीवन-भर
प्रेरणा पाने के लिए
अनुपम, अदितित्व सौन्दर्य मूत्र
तुमने ही विसर्जित होना चाहता हूँ


पर आशा, 
मैंने तेरे भंवर में लोगो को बर्बाद होते देखा
तुझे पाने के लिए, लोगो को तड़पते देखा
कहीं यह सब तेरा छल तो नहीं???

नहीं! नहीं! नहीं! तुम मेरी आशा हो
केवल मेरी ही आशा
तुम्हारी किरणों से ही तो
मेरे ह्रदय में अंकुर फूटा है
फिर कैसे रह सकूँगा होके तुमसे जुदा

मेरी आशा है की मेरी "आशा" मुझे मिलेगी
क्योंकि तुम मेरी आशा हो और मैं तुम्हारा आशिक 

विनोद पासी 'हंसकमल"

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