कवि! तेरा ह्रदय क्यों डोल उठा
चहकने दे उसे, उसका मन चंचल हो रहा
तू क्यों उसकी खातिर ज़ग-जीवन छोड़ उठा
वो बोलेगा, वो चीखेगा, वो चिल्लाएगा
क्या तू, उसकी बोली को समझ पायेगा?
क्या तू उसकी मूक भावनायों को
पूर्णतय समझ, कलम-बध्य कर पायेगा ?
क्यों करता व्यर्थ प्रयास अरे
वो तो तुझ सा जीव ही नहीं
तेरी लेखनी को समझ सके
इसका भी उसको ज्ञान नहीं
य़े शुक तो अभी उड़ जायेगा
तू मरकर अमर हो जायेगा
यह कैसा अन्याय कवि,
तेरे कवित्य को प्रेरित करने वाला
कभी किसी को याद नहीं आयेगा,
बस तेरा ही नाम इस ज़ग में रह जायेगा
विनोद पासी "हंसकमल'
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