जानती थी तुम नहीं आयोगे
व्यर्थ ही इंतज़ार करती थी
कुछ चाहने वाले भी मिले सफ़र में
पर मेरी चाह तो तुमसे बंधी थी
मेघ कितने ही बरसे
पर चातक की प्यास तो नहीं बुझती
नाज़ था मुझे अपनी चाहत पर
खींच लाएगी तुमको इक रोज यहाँ
अब तो टूट रही है दूर ज़िन्दगी की
किस धागे से बाँधे आओगे यहाँ?
सोचती थी गर्व चूर करूंगी तुम्हारा
पर भटक गयी थी, भूल गयी थी
समर्पण की रीत, किसी को पाने के लिए
स्वयं को मिटाना ज़रूरी है
समपर्ण की रीत से अनभिज्ञ थी
पर समर्पित ज़रूर थी
तुम्हारे ह्रदय के तार न झनझनाए हो
मगर मेरी वीणा सपंदन से भरपूर थी
जानकर अब क्या करोगे, मेरी व्यथा को
सुलगती चिंगारी को रख में दब जाने दो
न तड़पाओ मुझे अब मेरे प्रीतम
व्यर्थ के इंतज़ार को अब मिट जाने दो
बस, अब मिट जाने दो
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