नशा चीज़ ही ऐसी है
देर सवेर हर किसी को चढ़
ही जाता है, और आदमी चूर
होकर नाचता है इस नशे में
नशा चाहे
सत्ता का हो, या शोहरत का
हुस्न का हो, या दौलत का
श्रेष्टता का हो या घमंड का
उपलब्धियों का हो या सुख सुविधायो क,
देर सवेर हर किसी को चढ़ ही जाता है
शराब को तो यूं ही बदनाम कर दिया लोगों नें
सुरा का नशा तो षण-भंगुर है, उतर ही जाता है
पर कोई और नशा हो तो उतरते उतरते उम्र
बीत जाती है और आदमी छिन-भिन्न हो जाता है
ऊँची उड़ान छोड़, धरती पर आ गिरता है
'उसका' यही विधान है सम्झाने का
विनोद पासी "हंसकमल"
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