दूर खड़ी किनारे पर
किसका इंतज़ार करती हो
अपनी नशीली आँखों से
किस पथिक को प्यार करती हो
होठों पे आई बात को
चुपचाप छुपाये रहती हो
कहीं मोती झड न जाए
कैद में उनको रखती हो
सुनी मांग को क्यों
सिन्दूर से वंचित रखती हो
पलकों की अस्पष्ट भाषा में
किससे घंटों बातें करती हो
चुपचाप खड़ी किनारे पर
किस किस से इंतज़ार कराती हो
अपने यौवन पुष्प पर
किस भँवरे को बुलबाती हो
दूर खड़ी किनारे पर
किसका इंतज़ार करती हो
विनोद पासी "हंसकमल"
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