ब्रह्माण्ड इनका
जब भी कभी टीवी चेनलों पर
बेजुबान जानवरों को जिंदा जलाते
या लाठियों से मरते लोगो का हजूम
देखता हूँ तो रूह कांप जाती है
अपने इंसान होने पर शुबहा होता है
इन्हीं के धरती पर हमने कब्ज़ा किया
इन्हीं के जंगलो को हमने नष्ट किया
इन्हीं का दूध पीकर हम बड़े हुए
इन्हीं के मांस को खाकर संतुष्टि पाई
इन्ही की सेवायो से जीवन यापन किया
इनको नपुंसक बना खेतो में जोत दिया
इनको भूखा-प्यासा रख, सटाकर, डराकर
उनको सर्कसो में इस्तेमाल कर मनोरंजन किया
और खुद पशु बनके इन पर बेशुमार ज़ुल्म किये
हम कैसे भूल सकते है, जब भी कभी टीवी चेनलों पर
बेजुबान जानवरों को जिंदा जलाते
या लाठियों से मरते लोगो का हजूम
देखता हूँ तो रूह कांप जाती है
अपने इंसान होने पर शुबहा होता है
इन्हीं के धरती पर हमने कब्ज़ा किया
इन्हीं के जंगलो को हमने नष्ट किया
इन्हीं का दूध पीकर हम बड़े हुए
इन्हीं के मांस को खाकर संतुष्टि पाई
इन्ही की सेवायो से जीवन यापन किया
इनको नपुंसक बना खेतो में जोत दिया
इनको भूखा-प्यासा रख, सटाकर, डराकर
उनको सर्कसो में इस्तेमाल कर मनोरंजन किया
और खुद पशु बनके इन पर बेशुमार ज़ुल्म किये
बचपन की मुस्कान को
उन असंख्य बच्चो के कौतुहल को
जो इन्हें देखने और समझने आते है
सर्कसो और चिड़ियाघरों में
जो थकते नहीं इनकी आकृतिया बना बना कर
अपनी कापियों के पन्नो पर,
जो बतियाते है इनसे, विचरते है,
इनके संग अपने कल्पना-लोक में
इनसे ही हो हमने रंगों की दुनिया समझी
और रच डाला अपना एक सुंदर सा संसार,
कपड़ो को भी रंगों का समिश्रण मिला इनसे
सच्चा सकून मिलता है इनके पास जाकर
पर
मैं क्या उम्मीद रखूँ, अपने उन हम वतनो से
जो व्याह के लाई दुल्हन को सताते है
उन्हें जिंदा भी जला देते है चंद रुपयों के लिए
जो भूर्ण हत्या को भी पाप नहीं समझते
जो कन्या पैदा होने पर ढोल नहीं बजाते
और मातम मानते ही अपने अन्दर
मैं क्यों उम्मीद रखूँ उन देशवासियों से
जो भूल चुके है अहिंसा का मतलब
जो धर्म, जाती, गोत्र के नाम पर अपनी
ही संतान को बेरहमी से मार देते है
मैं क्यूं उम्मीद रखूँ उन चंद सिरफिरों से
जो नन्ही मुन्नी कलियों का शीलभंग
कर क़त्ल कर देते है और खा जाते है अंगो को पकाकर
इसलिए मेरी हर एक से फरियाद है
बंद करो य़े अत्याचार , बंद करो य़े अत्याचार
य़े धरती, य़े ब्रह्माण्ड पहले इनका है,
हम तो आये है बहुत बाद.
विनोद पासी "हंसकमल"
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