तेरे यौवन की सरिता में
नित्य नए नए अम्बुज खिलते है
तेरे नयनों की मदिरा से
प्यासों के उर भी भरते है
न नीर बहा इन नयनों से
आँचल शर्मिंदा होता है
न देख मुझे ऐ मृगनयनी
ह्रदय मेरा तो रोता है
लबों पे ला स्वर्णिम लालिमा
रवि को तू नीचा दिखला
उठा के अपनी पलकों को
ज़ग को अपनी सुषमा दिखला
केशो को अपने यूं बिखरा
मेघो में गर्जना हो जाए
दंत्मुक्तावाली अपनी यूं दिखला
बिजली बी शर्मिंदा हो जाए
तेरे दो मीते बोले से
पक्षी भी चहकना रुक जाए
तेरे तीखे नयनों से
बैरागी भँवरे मर जाए
मदहोश कर अपनी जवानी को
मदहोश कर तू जवानों को
रोने के दिन है बहुत पड़े
न व्यर्थ गवा इन घड़ियों को
आने दे चेहरे पे लाली
लाली आने को मचलती है
उस लाली के दर्शन को
ऐ रूपमती, मेरी जवानी तरसती है
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