य़े बादल य़े वर्षा
य़े पर्वत का आँचल
य़े टप टप बरसती बूंदों का अमृत
य़े भूरे सफ़ेद बादलों का समागम
य़े झूलो के मान्निद पेड़ो का हिलना
य़े परिंदों की चूँ चूँ, और उनकी उड़ाने
य़े नहाये हुए पेड़ो की सरसराहट
य़े जलाशयों में घूमती फिरती बत्तखे
य़े मिट्टी की सोंधी महक का बिखरना
य़े धुन्द के पर्दों में सब कुछ सिमटना
यह सारे शहर का यूं चम चम चमकना
मुझे अपने आगोश में ले रहे है
मैं पुलकित हूँ इसके प्रांगन में आ कर
यहीं रहना चाहता हूँ जीवन भर अब तो
कृति- विनोद पासी "हंसकमल'
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