Wednesday, 4 July 2012


कहाँ है वो राजकुमार
जो सफ़ेद घोड़े पर
सवार होकर आता था
मेरे नन्हे मन में
जब मैं  सहेलियों संग
रचती थी ब्याह
काठ की गुड़ियों का 

काठ की गुड़ियाँ, कपड़ो में बदली,
रंगीन बर्तन, अलमूनियम में बदले
गुड़ियों ने भी कई रूप बदले
घोडा बदला गाड़ी में
पर वो राजकुमार कभी न आया
और खुशियाँ  लुप्त हो गयी जिंदगी से

जान गयी हूँ,पहचान गयी हूँ
कभी कोई राजकुमार नहीं आता
हमारी दुनिया में-
आते है बस बहरूपिये
जो कर लेते है कैद अपनी बंदिशों में
मेरे जैसी  उन सब गुड़ियों को
जो सपने देखती है  बचपन से
और डुबो देतें है उनको
आंसुयों  के भंवर में
दर्द के एक असीम सागर में


पर मेरा मन, आज भी कहीं
खोया है, उन यादों में बेसब्री से
इंतज़ार कर रहा  है
उस राजकुमार का,
जो सफ़ेद घोड़े पर सवार होकर आता था
मेरे मानसपटल पर, मेरी काठ की
गुडिया को ब्याहने



विनोद पासी 'हंसकमल"

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