नयी आशाएं और अपेक्षाएं
मरुस्थल में एक नयी आस लिए
उगते सूरज से भरपूर आकाश लिए
खामोश कदमो से एक नयी प्यास लिए
एक मृगतृष्णा का रूप लिए
जीवन के सुखद और कठोर पलों को समेटे
अपने तन-मन से लिपटाये हुए
आन खड़ी है ज़िन्दगी, मेरे ही आंगन में
एक नया अक्स लिए
यह मैं हूँ या मेरी परछाई है
पर जो भी है मन भाई है
एक साथी नया नवेला है
जो हर पल मुझ संग जीता है
मेरे ख्यालों को ऐसे पड़ता है
जैसे नज़र आते हो उसको
विनोद पासी "हंसकमल
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